Thursday, August 27, 2009
भविष्य
ये एक ऐसा शब्द है जिसके नाममात्र पर हम अपने वर्त्तमान का गला घोंट रहे हैं | एक झूठी आस, एक बुझती आशा का दीप, बस इसी के ख्याल में हम खोये हुए हैं | कल ऐसा होगा, वैसा होगा.. ये करेंगे..वो करेंगे.. का निरर्थक वाक्यांश हमारे वर्त्तमान के पंछी के पर काट रहा है | जब हमें सच में ये आभास हो जाएगा की जो आज है, अभी है, वही हमारा साथ .. निरंतर ...सदा सर्वदा देगा , तब शायद हम उस झूठे भविष्य की परिकल्पना करना छोड़ अपने वर्त्तमान को सावारेंगे !!!
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